شعر _ نظامی گنجوی

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اي شاه سوار ملك هستي | |
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سلطان خرد به چيره دستي |
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اي ختم پيغمبران مرسل | |
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حلواي پسين و ملح اوّل 1 |
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اي حاكم كشور كفايت | |
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فرمانده فتوي ولايت |
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هرك آرد با تو خود پرستي | |
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شمشير ادب خورد دو دستي |
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اي بر سر سدره گشته راهت 2 | |
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و اي منظر عرش پايگاهت |
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اي خاك تو توتياي بينش | |
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روشن به تو چشم آفرينش |
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شمعي كه نه از تو نور گيرد | |
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از باد بروت 3 خود بميرد |
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دارنده حجّت الهي | |
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داننده راز صبحگاهي |
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اي سيّد بارگاه كونين | |
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نسّابه شهر قاب قوسين 4 |
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اي صدرنشين عقل و جان هم | |
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محراب زمين و آسمان هم |
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اي شش جهت از تو خيره مانده | |
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بر هفت فلك جنيبه 5 رانده |
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اي كنيت و نام تو مؤيّد | |
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بوالقاسم وآنگهي محمّد |
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اي شاه مقربّان درگاه | |
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بزم تو وراي هفت خرگاه |
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صاحب طرف ولايت جود | |
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مقصود جهان، جهان مقصود |
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آن كيست كه بر بساط هستي | |
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با تو نكند چو خاك پستي |
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اكسير تو داد خاك را لون | |
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وز بهر تو آفريده شد كون |
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سرخيل تويي و جمله خيلند | |
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مقصود تويي همه طفيلند |
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سلطان سرير كايناتي | |
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شاهنشه كشور حياتي |
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لشكر گه تو سپهر خضرا | |
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گيسوي تو چتر و غمزه، طغرا 6 |
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وين پنج نماز كاصل توبه است | |
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در نوبتي تو پنج توبه است 7 |
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در خانه دين به پنج بنياد | |
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بستي در صدهزار بيداد | |