شعر _ عطار نیشابوری

|
سبحان قادري كه صفاتش ز كبريا | |
|
بر خاك عجز ميفكند عقل انبيا |
|
|
گر صد هزار قرن همه خلق كاينات | |
|
فكرت كنند در صفت و عزّت خدا |
|
|
آخر به عجز معترف آيند كاي اله | |
|
دانسته شد كه هيچ ندانستهايم ما |
|
|
لبيك عشق زن تو درين راه خوفناك | |
|
و احرام دردگير درين كعبه رجا |
|
|
جاويد در متابعت مصطفي گريز | |
|
تا نور شرع او شودت پير و مقتدا |
|
|
خورشيد خلد معتر دنيا و آخرت | |
|
سلطان شرع خواجه كونين مصطفي |
|
|
چشم و چراغ سنّت و نور دو چشم دين | |
|
صاحب قبول هفت قران صاحب لوا 1 |
|
|
كان بود كلّ عالم و او بود آفتاب | |
|
مس بود خاك آدم و او بود كيميا |
|
|
يك شب براق تاخت چو برق از رواق چرخ | |
|
از قدسيان خروش برآمد كه مرحبا |
|
|
در پيش او كه غاشيه كش بود جبرئيل | |
|
هم انبيا پياده دويدند و اصفيا |
|
|
از دست ساقي وَسَقاهُم 2 شراب خواست | |
|
حالي شراب يافت ز جام جهاننما |
|
|
شيرخدا و ابن عم خواجه آنكه يافت | |
|
تختي چو دوش خواجه و تاجي چو هل اتي 3 |
|
|
چون مصطفاش در اسدالله مثال داد | |
|
طغراي آن مثال كشيدند لافتي 4 |
|
|
گر در ثناي تو دم عيسي مراست بس | |
|
در وصف تو چگونه بر آرم دم ثنا |
|
|
بسيار گفتم و بنگفتم يكي هنوز | |
|
دردا كه نيست درد مرا اندكي دوا |
|
|
چون من به صد زبان مقرم 5 بر گناه خويش | |
|
اي دست گير خلق، چه حاجت بود گوا |
|
|
از فضل خود نويس برات نجات من | |
|
بر من ببخش و بر عمل من مده جزا |
|
|
در عمر يك نفس كه به صدفي برآمده است | |
|
حشرش بر آن نفس كن و بگذار ما مضي 6 | |
پينوشتها:
1- هفت قران: ظاهراً اشاره به تمام ازمنه و دورانهاست. براي معني (لواء) واحاديث آن (رك: شماره5 بخش اسدي طوسي در همين كتاب.)
2- وسقيهم: اشاره به آيه شريفه: 21 سوره هل اتي (= الانسان): ... و سقاهم ربّهم شراباً طهوراً.
3- اشاره است به سوره هل اتي كه در شأن علي(ع) و اهل البيت(ع) نازل شده است.
4- اشاره است به: لافتي الاّ علي لاسيف الاّ ذوالفقار
5- مقّر= معترف، اقراركننده.
6- مامضي: آنچه گذشته است.